टेसू एवं गरबा रानी का पर्व: लुप्त होने की कगार पर भारतीय लोक कला एवं संस्कृति को संभाले रखा गरीब बच्चों ने,,,, हरदा/। हमारे देश मैं कई लोग कला एवं संस्कृति तथा परंपरा निभाई जाती है इन्हीं परंपराओं को त्योहारों के रूप में बनाया जाता है नवरात्रि के समाप्ति एवं दशहरे पर्व के दूसरे रोज से , टेसू का पर्व मनाया जाता है बच्चों के द्वारा टेसूका पुतला बनाकर उसे घुमाया जाता है यहां एक पारंपरिक लोक संस्कृति का पर्व है इस पर्व में छोटे-छोटे बच्चे टेसू बनाकर घुमाते हैं, टेसू आया स्टेशन से रोटी खाया बेसन से, पानी पिया ठंडा और लुगाई को मारा डंडा ऐसी कविताओं की पंक्तियों गाकर बच्चे इस पर्व को मनाते है किंतु आजकल यह संस्कृति परंपरा का पर्व लुप्त होने की कगार पर है केवल इस संस्कृति परंपरा को गरीब बच्चों ने ही हम आ रखा है उन के बल पर ही पारंपरिक पर्व कहीं-कहीं देखा जा सकता है अन्यथा यह संस्कृति तो लुप्त की ओर है भारत की कहीं परम परी संस्कृति सभ्यता लुप्त होने की कगार पर है अगर इन्हें नहीं बचाया गया तो आने वाली पीढ़ी के लिए यहां एक इतिहास बनकर ही रह जाएगी अगर हमारी भारतीय संस्कृति सभ्यता प्राचीन परंपरा को बनाए रखना है तो ऐसी संस्कृति सभ्यता को सरकार के माध्यम से बचाया जा सकता है सरकार चाहे तो ऐसे प्रभु को शासकीय स्तर पर समारोह पूर्वक मनाएं तो यह संस्कृति परंपराएं बच सकती है
पर्व भी छोटी बच्चियों के द्वारा मनाया जाता है इसमें बच्ची द्वारा एक मटकी में दीपक जलाकर उसमें कोड़िया रखकर उसे जगह-जगह घुमाया जाता है लोग पक्षियों को दक्षिणा देकर इनसे गरबा रानी का गीत सुनते हैं यह परंपरा भी लुप्त की ओर है
[: टेसू एवं गरबा रानी का पर्व लुप्त होने की कगार पर