'मुझे गर्व महसूस होता है कि अपने देश की आजादी के लिए फांसी के तख्ते पर झूलने वाला मैं पहला मुस्लिम हूं।' 

 


 


'मुझे गर्व महसूस होता है कि अपने देश की आजादी के लिए फांसी के तख्ते पर झूलने वाला मैं पहला मुस्लिम हूं।' 


😒काकोरी कांड में राम प्रसाद बिस्मिल के साथ अशफाकुल्ला खां ने भी अहम भूमिका निभाई थी जिसके लिए दोनों दोस्त को एक साथ फांसी दी गई थी।


 


भारत की आजादी के लिए लड़ रहे क्रांतिकारियों का मानना था कि हथियार के दम पर ही भारत को अंग्रेजों के चंगुल से आजाद कराया जा सकता है। इसी मकसद से हिंदुस्तान रिपब्लिकन आर्मी नाम के सशस्त्र संगठन की स्थापना महान क्रांतिकारी राम प्रसाद बिस्मिल के नेतृत्व में की गई थी। राम प्रसाद बिस्मिल के नेतृत्व में ही अंग्रेजों के सरकारी खजाने को लूटने की योजना बनाई गई और काकोरी में उसे अंजाम दिया गया। इसमें राम प्रसाद बिस्मिल के अलावा अहम भूमिका निभाने वाले में अशफाकुल्ला खां शामिल थे। काकोरी कांड के मामले में राम प्रसाद बिस्मिल के साथ अशफाकुल्ला खां को भी फांसी दी गई थी। आज ही के दिन यानी 19 दिसंबर, 1927 को उनको फांसी की सजा दी गई थी। आइए आज इस मौके पर अशफाकुल्ला खां से जुड़ीं खास बातें जानते हैं... 


 


 


अशफाकुल्ला खां का जन्म 22 अक्टूबर, 1900 को शाहजहांपुर में हुआ था। उनके पिता का नाम शफीकुल्ला खां था जो एक सैन्य परिवार से थे। उनकी मां मजहरुननिशां बेगम एक काफी धार्मिक महिला थीं जो एक शिक्षित परिवार से आती थीं। उनके ननिहाल के कई रिश्तेदार ब्रिटिश भारत में उच्च पदों पर थे। 


 


अशफाकुल्ला चार भाइयों में सबसे छोटे थे। उनका बड़ा भाई रियासतुल्ला खान और राम प्रसाद बिस्मिल सहपाठी थे। एक षडयंत्र के आरोप में राम प्रसाद बिस्मिल को भगोड़ा घोषित कर दिया गया था। उसी दौरान रियासतुल्ला खां अपने भाई को बिस्मिल के काम और शायरी के बारे में बताते थे। 


 


बिस्मिल से दोस्ती 


अपने भाई से बिस्मिल की काफी तारीफ सुनकर उनकी बिस्मिल से मिलने की तीव्र इच्छा हुई। आगे चलकर उनके बीच गहरी दोस्ती हो गई। 1920 में जब बिस्मिल शाहजहांपुर आए तो अशफाक ने मिलने की कोशिश की लेकिन बिस्मिल ने उस समय ध्यान नहीं दिया था। दोनों के बीच 1922 में असहयोग आंदोलन के समय काफी घनिष्ठ संबंध बने। चौरी चौरा कांड के बाद जब महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन वापस लिया तो देश के बहुत से युवा को लगा कि उनके साथ धोखा हुआ है। उन युवाओं में अशफाक भी शामिल थे। देश को आजाद कराने के उद्देश्य से वह बिस्मिल के करीब आए और आर्य समाज के सक्रिय सदस्य बन गए। बिस्मिल आर्य समाज के सक्रिय सदस्य थे और समर्पित हिंदू थे लेकिन वह हर धर्म को बराबर सम्मान देते थे। दूसरी ओर पक्के मुस्लिम होने के बावजूद अशफाकुल्ला का स्वाभाव भी ऐसा ही थी। इससे दोनों गहरे दोस्त बन गए। 


 


 


 


काकोरी कांड की योजना 


असहयोग आंदोलन को वापस लेने के बाद युवाओं में रोष था। वे हथियार के बल पर आजादी लेना चाहते थे। हथियार, बम आदि के लिए बड़ी मात्रा में पैसा चाहिए था। पैसा कहां से आएगा इसकी योजना राम प्रसाद बिस्मिल के नेतृत्व में बनाई गई। एक दिन बिस्मिल शाहजहांपुर से लखनऊ ट्रेन से जा रहे थे। उन्होंने देखा कि हर स्टेशन पर स्टेशन मास्टर पैसे का थैला गार्ड को लाकर देता था और गार्ड ने कैश लखनऊ जंक्शन पर स्टेशन अधीक्षक को थमा दिया। वहीं से बिस्मिल के दिमाग में गार्ड से पैसा लूटने का विचार आया। उनलोगों ने 9 अगस्त, 1925 को योजना को अमलीजामा पहनाया। जब ट्रेन काकोरी में पहुंची तो रुकवाकर गार्ड और यात्रियों को कब्जे में ले लिया। इसके बाद वे नकदी लेकर फरार हो गए। 


 


 


इस घटना की जांच के लिए ब्रिटिश वायसराय ने स्कॉटलैंड यार्ड की सेवा ली। एक महीने की जांच के अंदर ब्रिटिश सरकार ने रातोंरात सभी क्रांतिकारियों को गिरफ्तार कर लिया। 26 सितंबर, 1925 की सुबह में शाहजहांपुर से बिस्मिल और अन्यों को गिरफ्तार किया गया। अशफाक किसी तरह फरार होने में कामयाब हो गए। वह वहां से बिहार चले गए जहां एक इंजिनियरिंग कंपनी में 10 महीने तक काम किया। अशफाक देश को आजाद कराने के लिए विदेश जाकर लाल हर दयाल से मिलना चाहते थे। वह दिल्ली पहुंचे और पता किया कि भारत से कैसे निकलना है। लेकिन उनके पठान दोस्त ने गद्दारी कर दी और पुलिस को उनके बारे में सूचना दे दी। उनको गिरफ्तार करके फैजाबाद जेल में हिरासत में रखा गया और उनके खिलाफ मामला दर्ज किया। उनके भाई रियासतुल्ला खां ने उस समय के नामी वकील कृपा शंकर हाजेला की मदद ली लेकिन अशफाक को बचा नहीं सके। अशफाक समेत चार क्रांतिकारियों को फांसी की सजा सुनाई गई। 19 दिसंबर, 1927 को उनको फांसी की सजा दे दी गई। 


 


 


अशफाक के अशफाक के अमर बोल  अमर बोल 


खून से खेलूंगा होली गर वतन मुश्किल में है। 


मेरा कोई सपना नहीं है और है तो सिर्फ एक कि मेरे बच्चे भी उसी चीज के लिए संघर्ष करें जिसके लिए मैं खत्म हो रहा हूं। 


न बच्चे रोएं, न बड़े रोएं, मैं अमर हूं! मैं अमर हूं! 


 


हिंदू-मुस्लिम एकता 


हालांकि अशफाकुल्ला खां पक्के मुस्लिम थे और राम प्रसाद बिस्मिल का संबंध आर्य समाज से था, लेकिन दोनों पक्के दोस्त थे। जब वह जेल में थे तो तसद्दुक खान नाम के पुलिस अधीक्षक ने दोनों के बीच नफरत का बीज बोने का काम किया। उसने खुद के मुस्लिम होने का फायदा उठाना चाहा लेकिन मजबूत इरादे वाला अशफाक को वह डिगा नहीं सका। अशफाकुल्ला खां ने उसको जवाब दिया, 'खां साहब, मुझे पूरा यकीन है कि ब्रिटिश भारत के मुकाबले कई गुना बेहतर होगा हिंदू भारत।' 


 


 


जब 19 दिसंबर, 1927 को अशफाकुल्ला को फांसी दी गई वह पहले मुस्लिम थे जिनको षडयंत्र के मामले में फांसी दी गई थी। राष्ट्र के नाम अपने आखिरी संदेश में उन्होंने लिखा, 'मुझे गर्व महसूस होता है कि अपने देश की आजादी के लिए फांसी के तख्ते पर झूलने वाला मैं पहला मुस्लिम हूं।' 


 


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